कहानी एक कुख्यात माफिया की, जिसके डर से थरथराने लगता यूपी-बिहार का शासन और प्रशासन, गर्लफ्रेंड बनी जान की दुश्मन
सचिन मुखी, August 23, 2024UTTAR PRADESH; 90 के दशक में अपराध की दुनिया का एक ऐसा नाम जिसके डर से लोग थर-थर कांपने लगते थे। केवल सीधे-सादे लोग ही नहीं, बल्कि सूबे के शासन-प्रशासन में उसके नाम की भनक से भय का मंजर पैदा हो जाता था। जिसका खौप इस कदर था कि राज्य के बड़े-बड़े बाहुबली नेता उसके सामने नतमस्तक रहते थे। जिसका नाम था श्रीप्रकाश शुक्ला। उत्तर प्रदेश के जिला गोरखपुर के एक छोटे से गांव मामखोर में पैदा हुआ एक बालक जिसकी कहानी आपको हैरान कर देगी। जिसने महज 25 साल की उम्र में जुर्म की दुनिया में बादशाहत हासिल कर ली। जिसने उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने की सुपारी ले ली। श्रीप्रकाश शुक्ला की दहशत केवल उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं थी बल्कि बिहार में भी उसके नाम का सिक्का चलता था।
बेशक पूर्वांचल गैंगस्टरों के लिए जाना जाता है। एक से एक गैंगस्टर यहां पैदा हुए हैं और दुश्मनी भी जमकर हुई है। न जाने कितनी जानें गईं, जिनका खुलासा आजतक नहीं हो पाया। उस दौर की दुश्मनी के दाग आज भी कई चेहरों के रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन श्रीप्रकाश शुक्ला ने सब की हवा बिगाड दी थी। 90 के दौर की उत्तर प्रदेश पुलिस गैंगस्टर श्रीप्रकाश शुक्ला को पकड़े में एकदम नाकाम साबित हुई थी। नाकाम इसलिए कि श्रीप्रकाश इतना शार्प मांइड गैंगस्टर था कि जिसकी एक तस्वीर तक किसी के पास नहीं थी। जिसको पुलिस पहचान तक नहीं पाती थी। या ये कहें कि पुलिस के पास उसका कोई पहचान का नमूना तक नहीं था। कि जिससे वह लोगों से पूछकर तहकीकात कर सके।
जुर्म की दुनिया में कैसे रखा कदम
बात 1993 की है जब श्रीप्रकाश शुक्ला की उम्र मात्र 20 बरस की थी। वह एक रोज अपनी बहन के साथ बाजार से लौट रहा था। तभी एक शख्स ने उसकी बहन को देखकर शीटी मार दी। श्रीप्रकाश अपनी बहन के साथ ऐसी हरकत बर्दास्त नहीं पाया। उसने मनचले शख्स को बीच बाजर में मारते मारते ढेर कर दिया। उसको मौत के घाट उतार दिया। जिस शख्स की श्रीप्रकाश शुक्ला हाथों जान गई वह वीरेंद्र शाही का आदमी था। बता दें कि वीरेंद्र शाही भी एक गैंगस्टर था। जिसकी अपनी अलग हवा थी। घटना के बाद हत्या को लेकर भयकंर हगांमा शुरू होता है। बात इतनी बढ़ जाती है कि सियासत को बीच में आना पड़ता है। उस दौर के नामचीन नेता रहे हरिशंकर तिवारी इस घटना में दिलचस्पी दिखाते हैं। किसी तरह तिवारी श्रीप्रकाश शुक्ला को समझाबुझा कर बैंकॉक भेज देते हैं। लेकिन कुछ समय बाद जब वह भारत लौटा तो वह एक कुख्यात गैंगस्टर के रूप में आया। जिसके बाद उसने बिहार और उत्तर प्रदेश में अपने आतंक से हडकंप मचा दिया।
किसको मानता था गुरू
आईपीएस राजेश पांडेय ने बताया, बिहार के मोकामा से कभी निर्दलीय विधायक चुने जाने वाले सूरजभान सिंह और श्रीप्रकाश शुक्ला की गहरी दोस्ती थी या यूं कहें कि शुक्ला सूरजभान को अपना गुरु मानता था। पूर्वांचल के कई टेंडरों में वीरेंद्र शाही और हरिशंकर तिवारी का दखल होता था। जिसकी वजह से बिहार के सूरजभान को दिक्कत होती थी। हां, हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र शाही के बीच प्रतिद्वंद्विता भी मानी जाती थी। इसी दौरान गोरखपुर स्थित मामखोर गांव के रहने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला ने गोरखपुर में पहली बार वीरेंद्र शाही पर अटैक कर दिया। उस दौरान हमले में वीरेंद्र शाही बाल-बाल बच गया। इस घटना के वक्त श्री प्रकाश के साथ अनुज सिंह, सुधीर त्रिपाठी और सूरजनभान भी मौजूद था।
जो कहता था वो करता था
आईपीएस पांडेय बताते हैं कि पहली बार जब वीरेंद्र शाही श्रीप्रकाश शुक्ला से बच गया था। दुबारा हमला किया फिर भी वीरेंद्र शाही की किस्मत इतनी बुलंद निकली और वह इस बार भी बच गया। लेकिन आईपीएस बताते हैं कि श्रीप्रकाश अपनी बात का इतना पक्का था कि जो ठान लेता था वह उसको पूरा करके ही मानता था। जो भी उसकी नजरों में खटकने लगता, वह उसके पीछे लग जाता। इस बीच वीरेंद्र शाही लखनऊ स्थित इंदरा नगर में अपनी तथाकथित प्रेमिका के लिए किराए पर रूम देखने के लिए निकला था। बेशक वीरेंद्र शाही भी बदमाश तबके का था। लेकिन वह नहीं चाहता था कि उसके ड्राइवर और गनर को उसकी गर्लफ्रेंड के बारे में पता चले। तभी पहले से नजर रख रहे श्रीप्रकाश ने 1997 की शुरुआत में ही वीरेंद्र शाही को सरेराह मौत के घाट उतार दिया। जानकारी के मुताबिक, वीरेंद्र शाही की मौत के बाद हरिशंकर तिवारी खुद ही एक-एक कर रेलवे के टेंडर छोड़ने लगे। दरअसल, जहां पर टेंडर में सूरजभान को दिक्कत आती, उसे श्रीप्रकाश शुक्ला खत्म कर देता था।
ऐसे हुआ UP STF का गठन
दरअसल, माफिया श्रीप्रकाश शुक्ला यूपी में पुलिस के लिए सिरदर्द बन चुका था। उन दिनों श्रीप्रकाश शुक्ला अपराध की दुनिया में बड़ा नाम था। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। पूर्वांचल के डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला ने तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले ली थी। यह बात जब कल्याण को पता चली तो आतंक के पर्याय गोरखपुर के रहने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला के खात्मे के लिए 4 मई 1998 को UP STF का गठन किया गया।
गर्लफ्रेंड और एक सिम बनी मौत की वजह
बता दें कि श्रीप्रकाश लंबे समय से एक ही सिम का इस्तेमाल करता रहा था। वहीं एसटीएफ ने फोन से जानकारी निकालकर एक मास्टर प्लान तैयार किया। यही नहीं, एसटीएफ ने गाजियाबाद में रहने वाली शुक्ला की प्रेमिका के घर का पता भी लगा लिया था। शुक्ला को निपटाने के लिए बड़ी उम्मीदों के साथ एसटीएफ ने जाल बिछाया और चप्पे-चप्पे पर हथियारबंद टीम तैनात कर दी। शुक्ला अनुज सिंह, सुधीर त्रिपाठी और भरत नेपाली के साथ एक सिएलो कार से गाजियाबाद पहुंचा था। जिसके बाद चारों ओर से घिर चुके श्रीप्रकाश और उसके साथियों को एसटीएफ ने मौत के घाट उतार दिया। इसी के साथ ही एक लंबे खूनी खेल के आतंक का अंत हो गया।