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बांग्लादेश में आंदोलन बना नरसंहार का ठिकाना, वहीं रजाकारों का नाम भी चर्चा में जानिए कौन थे रजाकार?

 बांग्लादेश में आंदोलन बना नरसंहार का ठिकाना, वहीं रजाकारों का नाम भी चर्चा में जानिए कौन थे रजाकार?

बांग्लादेश में आरक्षण खत्म करने की मांग को लेकर बवाल मचा हुआ है। वहीं शेख हसीना ने अपने पद से इस्तीफा ही नहीं दिया बल्कि देश ही छोड़ दिया है। देश की कानून व्यवस्था भी पूरी तरह से ठप हो गई है। आंदोलनकारियों ने इस आंदोलन को उपद्रव और नरसंहार का ठिकाना बना दिया है। सैकड़ों लोगों की जानें जा चुकी हैं। लेकिन उपद्रवी बिना किसी डर के आवामी लीग के नेताओं और विभिन्न प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहे हैं। इस पूरे बवाल के बीच रजाकार नाम बहुत सुनने को मिल रहा है। वहीं सोशल मीडिया पर वायरल वीडियों में रजाकार नाम के नारे लगाते हुए भी नजर आ रहे हैं।

क्या है रजाकार नाम की कहानी

वर्ष 1971 में जब बांग्लादेश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। तब पाकिस्तान ने रजाकार नाम की एक क्रूर सेना का गठन किया था। जो पाकिस्तानी सेना के लिए जासूसों का काम करते थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान के संग्राम के दौरान रजाकारों ने बांग्लादेश के लोगों पर खूब जुल्म किए और महिलाओं की इज्जत लूटी। यहीं वजह है कि बांग्लादेश में रजाकार नाम को अपमान जनक माना जाता है। मूल बात यह है कि रजाकारों ने पाकिस्तान की सेना का साथ दिया था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बांग्लादेश की आजादी के युध्द के दौरान रजाकार एक सशस्त्र बल का काम करते थे। जिसमें अधिकतर पाकिस्तान का समर्थन करने वाले बंगाली और बिहारी मुसलमान थे। इसका गठन भी पाकिस्तान के जनरल टिक्का खान ने किया था।

रजाकारों में ऊर्दू बोलने वालों की संख्या अधिक

रजाकारों में ऊर्दू बोलने वाले बिहारी मुस्लिमों की संख्या अधिक थी। जमात ए इस्लामी, अल बद्र और अल शम्स जैसे संगठन रजाकारों के संगठन माने जाते हैं। साल 2019 में बांग्लादेश की सरकार ने 10,789 रजाकारों के नाम प्रकाशित किए थे।  जिन्होंने बांग्लादेश की लड़ाई के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया था। जमात ए इस्लामी के नेता एकेएम यूसुफ, जिसे रजाकार फोर्स का संस्थापक भी माना जाता है। साल 2013 में मानवता के खिलाफ अपराध मामले में गिरफ्तार किया गया था और साल 2014 को हिरासत में ही दिल का दौरा पड़ने से उसकी मौत हो गई थी। 

 

 

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