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साइकिल से संसद का सफर

आज हम आपको एक ऐसी शख्सियत की कहानी बताने जा रहे हैं। जिसने उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव से निकल कर देश की संसद में दस्तक दी। जिसका जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में हुआ। एक किसान परिवार में जन्मे इस साधरण बालक की कहानी आपको हैरान कर देगी। जिसने अपनी जीवन गाथा अपने संघर्ष की कमल से खुद लिखी। जिसका नाम था 'मुलायम सिंह' यादव। आईए आज हम आपको बताएंगे अखाड़े के पहलवान से सियासत के पहलवान बनने की पूरी दास्तां। 

पिता चाहते थे पहलवान बनाना

बता दें कि पिता सुधर सिंह मुलायम को पहलवान बनाना चाहते थे। इसके लिए  मुलायाम ने भी पुरजोर तरीके से जोर आजमाइश शुरू कर दी थी। वहीं मुलायम ने मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-दंगल में एक नामी पहलवान को चित्त करके अपने राजनीतिक गुरू नत्थूसिंह का दिल जीत लिया। पहलवानी का दंगल जीतने के बाद मुलायम ने राजीनीति के दंगल एंट्री ले ली। उन्होंने नत्थूसिंह के परंपरागत विधान सभा क्षेत्र जसवंतनगर से अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की। 

मुलायम के राजनीतिक आका

मुलायम सिंह ने समाजवादी विचारधारा के नेता राम मनोहर लोहिया और राज नरायण की छत्रछाया में राजनीति का ककहरा सीखा। जिसके बाद मुलायम अपने गृह जनपद इटावा की जसवंतनगर सीट से पहली बार संघट सोशलिस्ट पार्टी की तरफ से चुनाव लड़े। इस विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने राजनीतिक दांवपेंच की बदौलत आरपीआई के प्रत्याशी को पछाड़ दिया। और मात्र 28 साल की उम्र में मुलायम विधानसभा पहुंचे। 1967 का साल मुलायम के लिए राजनीतिक सफर का ऐतिहासिक साल रहा। जो हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया।

चंदा जुटाकर खरीदी एंबेसडर

बता दें कि राजनीति के जानकार मुलायम के इस पहले चुनाव की चर्चा आजतक करते हैं। बताते हैं कि किस तरह मुलायम और शिवपाल साइकिल के गांव -गांव जाकर चुनाव प्रचार करते थे। उस दौरान उनके पास कोई बाईक या गाड़ी नहीं होती थी। वह अपने साथियों के साथ साइकिल से प्रचार करते थे। मुलायम की इस मेहनत को देखकर उनकी पार्टी और गांव वालों ने चंदा जुटा कर एक एंबेसडर गाड़ी खरीदी। लेकिन अब उसमें रोज तेल भराने की समस्या सामने आने लगी। लेकिन किसी तरह गांव वालों ने उस समस्या का समाधान निकाला। मुलायम और उनकी पार्टी के लोगों की बेतहाशा मेहनत का परिणाम ये निकला कि पहलावन मुलायम अब नेताजी मुलायम के नाम से जाने जाने लगे।

मुलायम सिंह यादव जसवंतनगर सीट से लगातार चुनाव जीतते रहे। इसी बीच साल 1977 में उनके राजनीतिक सफर में एक नया मोड़ आया और पहली बार राज्यमंत्री बने। उस वक्त देश में कांग्रेस विरोधी लहर चल रही थी। वहीं उत्तर प्रदेश में जनता सरकार बनी थी। मुलायम अपने राजनीति दांवपेंच को खेलते हुए 1980 के आखिर में चौधरी चरण सिंह के लोक दल में शामिल हुए और प्रदेश के अध्यक्ष बन गए। जो बाद में जनता दल का हिस्सा बन गया।

1989 में मुलायम पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। नवंबर 1990 में केंद्र में वीपी सिंह की सरकार गिर गई तो मुलायम सिंह चंद्रशेखर की जनता दल (समाजवादी) में शामिल हो गए। और कांग्रेस के समर्थन से सीएम की कुर्सी पर काबिज रहे। जब  अप्रैल 1991 में कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया तो मुलायम सिंह की सरकार गिर गई। 1991 में यूपी में मध्यावधि चुनाव हुए जिसमें मुलायम सिंह की पार्टी हार गई और बीजेपी सत्ता में आई।

सपा का जन्म

बता दें कि 4 अक्टूबर, 1992 को लखनऊ के बेगम हजरत महल पार्क में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी बनाने की घोषणा कर दी। समाजवादी पार्टी की कहानी मुलायम सिंह के सियासी सफर के साथ-साथ चलती रही। मुलायम सिंह यादव ने जब अपनी पार्टी खड़ी की तो उनके पास बड़ा जनाधार नहीं था। नवंबर 1993 में यूपी में विधानसभा के चुनाव होने थे। सपा मुखिया ने बीजेपी को दोबारा सत्ता में आने से रोकने के लिए बहुजन समाज पार्टी से गठजोड़ कर लिया। समाजवादी पार्टी का यह अपना पहला बड़ा प्रयोग था।

मुलायम का कुनबा

मुलायम सिंह के कुनबे की बात करें तो ये पांच भाई- बहिन थे। जिनमें से शिवपाल यादव नेता जी मुलायम के बेहद प्रिय माने जाते थे। बता दें कि शिवपाल यादव भी मुलायम सिंह पर जान कुरबान करते थे। उनके हर सुख दुख में  कंधे से कंधा मिलाकर साथ देते थे। दोनों भाईयों की जोड़ी के चर्चे देशभर की सियासत में चलते थे। मुलायम के दौर में शिवपाल यादव की तूती बोतली थी। राजनीति के जानकार तो यहां तक कहते हैं कि एक में दौर शिवपाल उनके सियासी वारिस भी माने जाते थे।

मुलायम सिंह का परिवार यूपी ही नहीं बल्कि देश में सबसे बड़े सियासी कुनबे के रूप में जाना जाता है। मुलायम सिंह ने अपने परिवार के हर उस शख्स को सियासत का खिलाड़ी बनने का मौका दिया, जिसने राजनीति में रुचि दिखाई। मुलायम ने सिर्फ अपने भईयों और बेटे को ही राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया बल्कि उनके भतीजे, बहुएं, पोते सभी सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं। सबसे बड़ा नाम है अखिलेश यादव। 

बता दें कि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव वर्तमान में कन्नौज से सांसद हैं। अखिलेश 2012 में मात्र 38 साल की उम्र में उत्तर प्रदेश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। इससे पहले वह लगातार तीन बार सांसद भी रह चुके हैं। पिता मुलायम सिंह यादव की मौत के बाद पार्टी की जिम्मेदारियों का दौर और बढ़ता चला गया। लेकिन अखिलेश यादव ने अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाया है। सपा सुप्रीमों अखिलेश यादव ने जब से सियासत में कदम रखा है या यूं कहें कि जब से पिता की राजनीतिक धरोहर की कमान संभाली है। वह तब से सक्रीय राजनीति का हिस्सा रहे हैं।  


 

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