क्या है बंगाल का अपराजिता बिल? जिसको लेकर देशभर में हो रही ममता की चर्चा
सचिन मुखी, September 04, 2024
WEST BENGAL; पश्चिम बंगाल सरकार ने कोलकाता के आरजी कर कॉलेज में महिला डॉ. के साथ हुए जघन्य अपराध को देखते हुए विधानसभा में बिल पारित किया है। जिसको अपराजिता महिला और बाल विकास नाम दिया गया है। इस विधेयक के माध्यम से पश्चिम बंगाल के आपराधिक कानून में कई संशोधन करने की बात कही है। संशोधित कानून में बदलाव कुछ इस तरह किया गया है कि तहरीर देने के बाद 21 दिन में जांच पूरी करनी होगी। अगर जांच के दौरान आरोपी को दोषी करार दिया जाता है तो 10 दिन में फांसी के फंदे पर चढ़ा दिया जाएगा। वहीं अभी तक प्रदेश में प्रचलित समय सीमा के अनुसार जांच पूरी करने का समय दो महीने का था।
बता दें कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस खास बिल के लिए दो दिन का सत्र बुलाया था। जिसमें बिल के 5 सितंबर 2024 से कानून बनाने की बात कही। सीएम ममता के मुताबिक विधेयक का लक्ष्य त्वरित जांच, त्वरित न्याय और आपराधियों को अधिकतम सजा देना है। पारित विधेयक महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा और साथ ही उत्पीड़न और दुष्कर्म जैसे मामलों में दोषियों को सख्त सजा दिलाएगा।
क्या चाहती थीं ममता?
टीएमसी सरकार चाहती थी कि मोदी सरकार कड़ा कानून लेकर आए । लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसको लेकर भाजपा नेता और विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने विधेयक में संशोधन प्रस्ताव रखा। लेकिन इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया गया। वहीं ममता ने प्रधानमंत्री मोदी , गृहमंत्री अमितशाह और देश के उन सभी मुख्यमंत्रियों से इस्तीफा देने की मांग की जो देश की महिलाओं की सुरक्षा के लिए प्रभावी कानून लागू नहीं कर सकते। वहीं ममता ने आरोप लगाते हुए कहा कि भारतीय न्याय संहिता पारित करने से पहले पश्चिम बंगाल से मशविरा नहीं लिया गया।
ममता के अपराजिता में क्या है खास?
बता दें कि पश्चिम बंगाल के पारित विधेयक में 2023 (बीनएस) भारतीय न्याय संहिता , भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और यौन अपराधों से बच्चों का सरंक्षण अधिनियम 2012 (pocso) में संशोधन की बात कही गई है।
- (बीएनएस) की धारा 64 के अनुसार दुष्कर्म के दोषी को कम से कम दस साल की सजा या उम्रकैद का प्रवधान है। लेकिन वहीं अपराजिता की बात करें तो दोषी पाए जाने के बाद पूरा जीवन जेल में बिताने और जुर्माने या सीधे मौत की सजा का प्रवधान है।
-पीड़िता की मौत हो जाने के बाद धारा 66 के मुताबिक 20 साल की सजा, उम्रकैद और फांसी का प्रवधान है। वहीं अपराजिता में सिर्फ फांसी का प्रवधान है।
-सामूहिक दुष्कर्म के मामले में धारा 70 के अनुसार दोषी को 20 साल की सजा, उम्रकैद और फांसी का प्रवधान है। जबकि अपराजिता में उम्रकैद या मौत का प्रावधान है।
-कोर्ट कार्यवाही संबंधी सामग्री बिना किसी अनुमती के प्रकाशित करना या किसी पीड़िता की पहचान उजागर करने पर (BNS) में दो साल की सजा निर्धारित की गई है। लेकिन अपराजिता में 3 से 5 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
-बीएनएस ने बाल अपराधियों के लिए रियायतों का प्रवधान है। लेकिन अपराजिता में इन्हें सिरे से खारिज करने का प्रस्ताव रखा है।
-इसके साथ ही ममता सरकार ने अपने प्रस्ताव में यौन उत्पीड़न के मामलों के लिए विशेष कोर्ट बनाने और पुख्ता जांच के लिए 'अपराजिता टास्क फोर्स' बनाने की मांग की है।